Thursday, 7 March 2019
Wednesday, 9 January 2019
Thursday, 20 December 2018
Thursday, 8 February 2018
पीढ़ी अन्तराल पाटने में शिक्षा की भूमिका
डाॅ0 रत्ना गुप्ता
शिक्षाविद्
आज जमाना तेजी से बदल रहा है। उसके साथ ही इंसान की सोच भी। आजकल माता पिता और बच्चों की दूरियाॅं आम बात हो गई है। माता पिता और बच्चों का वर्षों पुराना रिश्ता काफी हद तक खत्म हो गया है। जनरेशन गैप के चलते माता पिता तिरस्कार का शिकार होने लगे है। हाई-टेक सन्तान अपने माता पिता को पुराने ख्यालों वाला समझने लगी हैं। लेकिन कभी सोचा है कि समाज के इस परिदृश्य का नतीजा आने वाले कुछ सालों में क्या होगा ?
परिवार के मामले में वेस्टर्न कल्चर फाॅलों करते करते हम न पूरी तरह से पाश्चात्य बन पाऐगें और न ही ठीक से हिन्दुस्तानी रह जायेगें।
कैम्ब्रिज एडवान्स्ड लर्नर डिक्सनरी के अनुसार ‘‘ जेनरेशन गैप इज ए सिचुएशन इन व्हिच ओल्डर एण्ड यंगर पीपुल्स डू नाॅट अन्डरस्टैन्ड ईज अदर विकाज आॅफ देअर डिफरेन्ट एक्सपीरिएन्सेज, ओपीनियन्स हैविट्स एण्ड विहेवियर।’’
बैब्स्टर’स न्यू वल्र्ड काॅलिज डिक्श्नरी के अनुसार ‘‘जेनरेशन गेप इज द सेट आॅफ डिफरेन्सेज इन आइडियाज एटीटयूडस एक्सपीरिएन्सेज दैट एक्जिस्ट बिटवीन एन ओल्डर एण्ड ए यंगर जेनरेशन’’
इस प्रकार पीढ़ी अन्तराल का अर्थ है विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के मध्य दृष्टिकोणों की भिन्नता जिसके परिणामस्वरूप आपसी समझ कम हो जाती है। यह दृष्टिकोणों की भिन्नता मूल्यों और विश्वासों, क्रियाओं एवं रूचियों, सामाजिक एवं सांस्कृतिक मानकों से सम्बन्धित होती है। इसके परिणामस्वरूप व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है तथा आपसी लगाव कम हो जाता है। वर्तमान में इसका तात्पर्य युवाओं और उनके माता पिता तथा दादा दादी के मध्य दृष्टिकोणों की भिन्नता से है। यद्यपि यह पीढ़ी अन्तराल हर युग में रहा है। लेकिन बीसवी सदी और ईक्कसवी सदी में इसकी जड़े अधिक फैल गयी हैं। इसके परिणामस्वरूप युवा एवं उनके माता पिता के मध्य संप्रेषण की कमी हो गयी है।
वर्तमान में ज्यादातर देखने में आ रहा है कि युवा वर्ग वृद्धों का अनादर कर रहा है तो बुजुर्ग पीढ़ी को युवाओं की स्वच्छन्द जीवन शैली नही भाती है। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इन पीढ़ियों के संघर्ष के लिये उत्तरदायी कौन है, कुछ लोगों का मानना है कि बुजुर्ग आज के युवक युवतियों पर तीखी टीका टिप्पणी करते है। कहते है कि हमारे जमानें में तो मर्यादा थी अब तो ऐसा लगता है कि सारी लाज शर्म बेंच खाई है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि बुजुर्ग सदैव ही दकियानूसी व आउट आॅफ डेट परम्पराओं को ढो रहे है। स्थिति यह है कि युवा पीढ़ी को अपनी जीवन शैली में दादा दादी तो दूर माता पिता की दखल अन्दाजी तक सहन नही होती है। पीढियों में संघर्ष के ये कारण हो सकते है। लेकिन इनके प्रमुख कारण निम्नलिखित प्रतीत होते है।
पहला कारण लगता है संस्कार विहीन शिक्षा/आज की शिक्षा में मूल्यों का नितान्त अभाव पाया जाता है। हम परस्पर कैसा व्यवहार करें, परिवार में एक दूसरे के साथ सम्बन्ध कैसे हो ? दया प्रेम, सेवा, त्याग व सहनशीलता का जीवन में कितना मूल्य है ? माता पिता दादा दादी के प्रति हमारा क्या कर्तव्य है? हम आज यह सब भूलते जा रहे है। संस्कार हीनता के कारण पीढियों के मध्य दरारें पैदा होती जा रही है।
दूसरा मुख्य कारण है आर्थिक परिस्थिति, बढ़ती हुई महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, अल्प आय आदि ऐसे अनेक कारण है जिनकी वजह से परिवार में अधिक सदस्यों की संख्या के खर्चों के बीच बुजुर्गों की बीमारी बोझ स्वरूप लगती है।
तीसरा कारण है आज की यन्त्रवत जीवन शैली। सुबह से शाम, काम ही काम। किसी शायर ने कहा है कि ‘सुबह होती है शाम होती है उम्र यूॅं ही तमाम होती है।’ इन स्थितियों में जीवन मूल्यों, आदर-अनादर, सेवा की आशा करना बेमानी है। बुजुर्ग अपने बेटे बहुओं की व्यस्तता को नजर अन्दाज कर उसे अपनी उपेक्षा मानने लगते हैं। बस यहीं से शुरू हो जाती है संघर्ष की शुरूआत।
चैथा कारण है सामाजिकता का अभाव। इसके कारण मानवीय संवेदनाएं व्यक्ति उन्मुख होती जा रही है। वास्तव में पीढियों का संघर्ष आज की ज्वलन्त समस्या है। पाश्चात्य शिक्षा पद्धति, अर्थ प्रधान समाज तथा अनेक प्रकार के सामाजिक मनौवैज्ञानिक कारणों से नई व पुरानी पीढियों में संघर्ष बढ़ता ही जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप ईष्र्या, द्वेष, कलह, उन्माद, निराशा तथा मानसिक उद्वेग बढ़ रहे है। कभी तो इस संघर्ष से उत्पन्न मानसिक तनाव - गृह क्लेश, पागलपन तथा आत्महत्या तक में परिणति होते देखे गया है। इस प्रकार के तनाव से जीवन में कटुता, विषाक्ता और खिन्नता भरी रहती है। जिसके कारण आत्मविश्वास के सारे मार्ग अवरूद्ध हो जाते है। अतः इस पीढ़ी अन्तराल को पाटना आवश्यक है। यह कार्य शिक्षा के द्वारा किया जा सकता है। इसके लिये शिक्षा में निम्न प्रावधान करने होगें -
- शिक्षा को मूल्यपरक बनाना होगा।
- नैतिक शिक्षा में श्रवण कुमार जैसे जीवन चरित्रों को सम्मिलित करना होगा।
- शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना होगा।
- साहित्य कला संगीत को शिक्षा के पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाना होगा।
- संयुक्त परिवार के लाभ एकल परिवार के दोष पाठ्यक्रम की विषयवस्तु के रूप में सम्मिलित किये जायें।
- बदलते मूल्य विषय पर सेमीनार का आयोजन किया जाये जिसमें अभिभावकों को आमंत्रित किया जाये
- बदलते मूल्यों पर नाटक, कविता, कहानी, गीत, प्रतियोगिताऐं, आयोजित की जाये और सभी कार्यक्रमों में अभिभावकों को आमंत्रित किया जाये।
- ग्रान्ड पेरेन्टस डे का सेलीब्रेशन किया जाये।
- शिक्षा समायोजन की क्षमता का विकास करें।
- सामाजिक गुणों का विकास करें।
- छात्रों को संवेदनशील बनाने का प्रयास किया जाये।
Tuesday, 17 January 2017
मित्रों
आज दि० 17-01-2017 के वीथिका‚ दैनिक जागरण लखनउ संस्करण में मेरी लघुकथा प्रकाशित हुई है।
व्यवहारिक डिग्री
एक थी नन्दिनी, पढ़ने में बड़ीऽऽ होशियार थी। कक्षा 6 में सरकारी विद्यालय में पढ़ती थी। एक दिन उसकी कक्षा अध्यापिका ने कक्षा की सभी छात्राओं को हिन्दी के ‘रामराज्य’ पाठ के समस्त प्रश्नोत्तर याद करके आने को कहा। नन्दिनी ने सभी प्रश्नोत्तर अच्छे से याद कर लिये। अगले दिन कक्षाध्यापिका ने पहला प्रश्न पूछा। केवल दो छात्राओं ने उत्तर देने के लिए अपना हाथ खड़ा किया। अध्यापिका ने एक-एक करके दोनो को उत्तर बताने को कहा, अधिक अच्छा उत्तर नन्दिनी ने ही बताया। इसी प्रकार जब उन्होने दूसरा प्रश्न पूछा तो केवल नन्दिनी उत्तर बता सकी। अन्य सभी प्रश्नों के भी उत्तर बताने वाली वह अकेली छात्रा थी। छात्राध्यापिका ने उसे शाबासी देते हुये कहा केवल एक ही छात्रा सारे उत्तर याद करके लायी है।
नन्दिनी बड़ी प्रसन्न हुयी। लेकिन उस दिन से उसके अन्दर घमण्ड का अंकुर फूट गया। जब परीक्षा परिणाम मिला, वह कक्षा में प्रथम आयी। द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाली छात्रा के उससे लगभग 100 अंक कम थे। आगे की कक्षाओं में भी उसकी ऐसी ही उपलब्धि रही लेकिन उसमें पड़ा घमण्ड का अंकुर बड़ा होता गया। वह सभी को अपने से कमतर समझने लगी और अपने आपको विशेष। उसे लगा कोई उसकी मित्रता के लायक नहीं है। उसने सभी से बातचीत करना बन्द कर दिया। अब उसका कोई मित्र न रहा। वह कक्षा में मध्यान्ह के समय भी पुस्तक निकालकर पड़ती रहती। खाना भी न ले जाती क्योंकि अकेले खाना खाते उसे अच्छा न लगता था। जब हम अपने आपको विशेष समझने लगते हैं तो हम बहुत अकेले हो जाते है। धीरे-धीरे उसका व्यक्तित्व अन्र्तमुखी हो गया। किसी-से भी बात करने में उसे घबड़ाहट होने लगी। न बोलने के कारण उसका सम्प्रेषण कौशल खराब हो गया, बोलते समय उसकी जुबान लड़खड़ाने लगी।
बड़ी होकर उसने एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की परास्नातक कक्षा में प्रवेश लिया यहाॅं उसका वास्ता बड़े-बडे़ शहरों के श्रेष्ठ महाविद्यालयों से आये छात्रों से पड़ा। यहाॅं उसे अपना अस्तित्व चींटी से भी कमतर लगा। वहाॅं सेमेस्टर प्रणाली थी, आन्तरिक मूल्यांकन था, सेमिनार, वाद-विवाद , मौखिक परीक्षायें दिन-प्रतिदिन होती थीं। अन्र्तमुखी होने के कारण उसे बड़ी परेशानी होती थी। सामान्यवर्ग के ज्यादातर छात्र उपलब्धि में उससे आगे रहते। कुॅंये का मेढक अब समुद्र में आ गया था जहाॅं बड़े-बड़े जीव थे। वह सोचने लगी कि अगर सारे होशियार छात्र उससे बात करना बन्द कर दें, तो क्या होगा? शायद वह अपने आपको अपमानित महसूस करेगी। जो कि अन्य छात्रोें से कम उपलब्धि के कारण वह पहले से ही करती है। उसने अपने आप से प्रश्न किया कि इतना अध्ययन करने पर भी उसके सर्वाधिक अंक क्यों नही आते? उसके अन्र्तमन ने उसे समझाने का प्रयास किया कि शायद इसलिये कि वह बहुत से छात्रों ने यहाॅं से स्नातक की पढ़ाई की है .............. बहुतों के भाई-बहिन, मम्मी पापा यहाॅं से पढ़े हैं ........... इसलिये वे यहाॅं की शिक्षा प्रणाली से अवगत है........... उपलब्धि इन सब बातों से भी तो प्रभावित होती हैं। सोचते सोचते वह अतीत में चली गयी............. उसके साथ भी जो छात्रायें पढ़ती थीं शायद किसी को घर का काम करना होता होगा ............ किसी को छोटे भाई-बहिन की देखभाल करनी होती होगी ............... किसी का घर एक कमरे का होगा .............. कहीं ज्यादा रिश्तेदार आते होगें........... उसके साथ ऐसा कोई बन्धन न था। शायद इसलिये उपलब्धि में वह आगे और अन्य छात्रायें उससे पीछे थीं। सोचतें सोचतें उसकी आॅंखे नम हो गयी। आॅंखों के पानी में उसका घमंड बह गया। इस परिसर ने उसे व्यवहारिक डिग्री से अलंकृत किया।
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