Thursday, 8 February 2018

पीढ़ी अन्तराल पाटने में शिक्षा की भूमिका


डाॅ0 रत्ना गुप्ता 
शिक्षाविद्

       आज जमाना तेजी से बदल रहा है। उसके साथ ही इंसान की सोच भी। आजकल माता पिता और बच्चों की दूरियाॅं आम बात हो गई है। माता पिता और बच्चों का वर्षों पुराना रिश्ता काफी हद तक खत्म हो गया है। जनरेशन गैप के चलते माता पिता तिरस्कार का शिकार होने लगे है। हाई-टेक सन्तान अपने माता पिता को पुराने ख्यालों वाला समझने लगी हैं। लेकिन कभी सोचा है कि समाज के इस परिदृश्य का नतीजा आने वाले कुछ सालों में क्या होगा ? 
परिवार के मामले में वेस्टर्न कल्चर फाॅलों करते करते हम न पूरी तरह से पाश्चात्य बन पाऐगें और न ही ठीक से हिन्दुस्तानी रह जायेगें। 
कैम्ब्रिज एडवान्स्ड लर्नर डिक्सनरी के अनुसार ‘‘ जेनरेशन गैप इज ए सिचुएशन इन व्हिच ओल्डर एण्ड यंगर पीपुल्स डू नाॅट अन्डरस्टैन्ड ईज अदर विकाज आॅफ देअर डिफरेन्ट एक्सपीरिएन्सेज, ओपीनियन्स हैविट्स एण्ड विहेवियर।’’
बैब्स्टर’स न्यू वल्र्ड काॅलिज डिक्श्नरी के अनुसार ‘‘जेनरेशन गेप इज द सेट आॅफ डिफरेन्सेज इन आइडियाज एटीटयूडस एक्सपीरिएन्सेज दैट एक्जिस्ट बिटवीन एन ओल्डर एण्ड ए यंगर जेनरेशन’’
इस प्रकार पीढ़ी अन्तराल का अर्थ है विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के मध्य दृष्टिकोणों की भिन्नता जिसके परिणामस्वरूप आपसी समझ कम हो जाती है। यह दृष्टिकोणों की भिन्नता मूल्यों और विश्वासों, क्रियाओं एवं रूचियों, सामाजिक एवं सांस्कृतिक मानकों से सम्बन्धित होती है। इसके परिणामस्वरूप व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है तथा आपसी लगाव कम हो जाता है। वर्तमान में इसका तात्पर्य युवाओं और उनके माता पिता तथा दादा दादी के मध्य दृष्टिकोणों की भिन्नता से है। यद्यपि यह पीढ़ी अन्तराल हर युग में रहा है। लेकिन बीसवी सदी और ईक्कसवी सदी में इसकी जड़े अधिक फैल गयी हैं। इसके परिणामस्वरूप युवा एवं उनके माता पिता के मध्य संप्रेषण की कमी हो गयी है। 
वर्तमान में ज्यादातर देखने में आ रहा है कि युवा वर्ग वृद्धों का अनादर कर रहा है तो बुजुर्ग पीढ़ी को युवाओं की स्वच्छन्द जीवन शैली नही भाती है। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इन पीढ़ियों के संघर्ष के लिये उत्तरदायी कौन है, कुछ लोगों का मानना है कि बुजुर्ग आज के युवक युवतियों पर तीखी टीका टिप्पणी करते है। कहते है कि हमारे जमानें में तो मर्यादा थी अब तो ऐसा लगता है कि सारी लाज शर्म बेंच खाई है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि बुजुर्ग सदैव ही दकियानूसी व आउट आॅफ डेट परम्पराओं को ढो रहे है। स्थिति यह है कि युवा पीढ़ी को अपनी जीवन शैली में दादा दादी तो दूर माता पिता की दखल अन्दाजी तक सहन नही होती है। पीढियों में संघर्ष के ये कारण हो सकते है। लेकिन इनके प्रमुख कारण निम्नलिखित प्रतीत होते है। 
  पहला कारण लगता है संस्कार विहीन शिक्षा/आज की शिक्षा में मूल्यों का नितान्त अभाव पाया जाता है। हम परस्पर कैसा व्यवहार करें, परिवार में एक दूसरे के साथ सम्बन्ध कैसे हो ? दया प्रेम, सेवा, त्याग व सहनशीलता का जीवन में कितना मूल्य है ? माता पिता दादा दादी के प्रति हमारा क्या कर्तव्य है? हम आज यह सब भूलते जा रहे है। संस्कार हीनता के कारण पीढियों के मध्य दरारें पैदा होती जा रही है। 
दूसरा मुख्य कारण है आर्थिक परिस्थिति, बढ़ती हुई महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, अल्प आय आदि ऐसे अनेक कारण है जिनकी वजह से परिवार में अधिक सदस्यों की संख्या के खर्चों के बीच बुजुर्गों की बीमारी बोझ स्वरूप लगती है। 
तीसरा कारण है आज की यन्त्रवत जीवन शैली। सुबह से शाम, काम ही काम। किसी शायर ने कहा है कि ‘सुबह होती है शाम होती है उम्र यूॅं ही तमाम होती है।’ इन स्थितियों में जीवन मूल्यों, आदर-अनादर, सेवा की आशा करना बेमानी है। बुजुर्ग अपने बेटे बहुओं की व्यस्तता को नजर अन्दाज कर उसे अपनी उपेक्षा मानने लगते हैं। बस यहीं से शुरू हो जाती है संघर्ष की शुरूआत। 
चैथा कारण है सामाजिकता का अभाव। इसके कारण मानवीय संवेदनाएं व्यक्ति उन्मुख होती जा रही है। वास्तव में पीढियों का संघर्ष आज की ज्वलन्त समस्या है। पाश्चात्य शिक्षा पद्धति, अर्थ प्रधान समाज तथा अनेक प्रकार के सामाजिक मनौवैज्ञानिक कारणों से नई व पुरानी पीढियों में संघर्ष बढ़ता ही जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप ईष्र्या, द्वेष, कलह, उन्माद, निराशा तथा मानसिक उद्वेग बढ़ रहे है। कभी तो इस संघर्ष से उत्पन्न मानसिक तनाव - गृह क्लेश, पागलपन तथा आत्महत्या तक में परिणति होते देखे गया है। इस प्रकार के तनाव से जीवन में कटुता, विषाक्ता और खिन्नता भरी रहती है। जिसके कारण आत्मविश्वास के सारे मार्ग अवरूद्ध हो जाते है। अतः इस पीढ़ी अन्तराल को पाटना आवश्यक है। यह कार्य शिक्षा के द्वारा किया जा सकता है। इसके लिये शिक्षा में निम्न प्रावधान करने होगें - 

  • शिक्षा को मूल्यपरक बनाना होगा।
  • नैतिक शिक्षा में श्रवण कुमार जैसे जीवन चरित्रों को सम्मिलित करना होगा।
  • शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना होगा।
  • साहित्य कला संगीत को शिक्षा के पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाना होगा।
  • संयुक्त परिवार के लाभ एकल परिवार के दोष पाठ्यक्रम की विषयवस्तु के रूप में सम्मिलित किये जायें। 
  • बदलते मूल्य विषय पर सेमीनार का आयोजन किया जाये जिसमें अभिभावकों को आमंत्रित किया जाये
  • बदलते मूल्यों पर नाटक, कविता, कहानी, गीत, प्रतियोगिताऐं, आयोजित की जाये और सभी कार्यक्रमों में अभिभावकों को आमंत्रित किया जाये। 
  • ग्रान्ड पेरेन्टस डे का सेलीब्रेशन किया जाये। 
  • शिक्षा समायोजन की क्षमता का विकास करें। 
  • सामाजिक गुणों का विकास करें।
  • छात्रों को संवेदनशील बनाने का प्रयास किया जाये।

Tuesday, 17 January 2017

मित्रों
आज दि० 17-01-2017 के वीथिका‚ दैनिक जागरण लखनउ संस्करण में मेरी लघुकथा प्रकाशित हुई है।

व्यवहारिक डिग्री

एक थी नन्दिनी, पढ़ने में बड़ीऽऽ होशियार थी। कक्षा 6 में सरकारी विद्यालय में पढ़ती थी। एक दिन उसकी कक्षा अध्यापिका ने कक्षा की सभी छात्राओं को हिन्दी के ‘रामराज्य’ पाठ के समस्त प्रश्नोत्तर याद करके आने को कहा। नन्दिनी ने सभी प्रश्नोत्तर अच्छे से याद कर लिये। अगले दिन कक्षाध्यापिका ने पहला प्रश्न पूछा। केवल दो छात्राओं ने उत्तर देने के लिए अपना हाथ खड़ा किया। अध्यापिका ने एक-एक करके दोनो को उत्तर बताने को कहा, अधिक अच्छा उत्तर नन्दिनी ने ही बताया। इसी प्रकार जब उन्होने दूसरा प्रश्न पूछा तो केवल नन्दिनी उत्तर बता सकी। अन्य सभी प्रश्नों के भी उत्तर बताने वाली वह अकेली छात्रा थी। छात्राध्यापिका ने उसे शाबासी देते हुये कहा केवल एक ही छात्रा सारे उत्तर याद करके लायी है।
नन्दिनी बड़ी प्रसन्न हुयी। लेकिन उस दिन से उसके अन्दर घमण्ड का अंकुर फूट गया। जब परीक्षा परिणाम मिला, वह कक्षा में प्रथम आयी। द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाली छात्रा के उससे लगभग 100 अंक कम थे। आगे की कक्षाओं में भी उसकी ऐसी ही उपलब्धि रही लेकिन उसमें पड़ा घमण्ड का अंकुर बड़ा होता गया। वह सभी को अपने से कमतर समझने लगी और अपने आपको विशेष। उसे लगा कोई उसकी मित्रता के लायक नहीं है। उसने सभी से बातचीत करना बन्द कर दिया। अब उसका कोई मित्र न रहा। वह कक्षा में मध्यान्ह के समय भी पुस्तक निकालकर पड़ती रहती। खाना भी न ले जाती क्योंकि अकेले खाना खाते उसे अच्छा न लगता था। जब हम अपने आपको विशेष समझने लगते हैं तो हम बहुत अकेले हो जाते है। धीरे-धीरे उसका व्यक्तित्व अन्र्तमुखी हो गया। किसी-से भी बात करने में उसे घबड़ाहट होने लगी। न बोलने के कारण उसका सम्प्रेषण कौशल खराब हो गया, बोलते समय उसकी जुबान लड़खड़ाने लगी।
बड़ी होकर उसने एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की परास्नातक कक्षा में प्रवेश लिया यहाॅं उसका वास्ता बड़े-बडे़ शहरों के श्रेष्ठ महाविद्यालयों से आये छात्रों से पड़ा। यहाॅं उसे अपना अस्तित्व चींटी से भी कमतर लगा। वहाॅं सेमेस्टर प्रणाली थी, आन्तरिक मूल्यांकन था, सेमिनार, वाद-विवाद , मौखिक परीक्षायें दिन-प्रतिदिन होती थीं। अन्र्तमुखी होने के कारण उसे बड़ी परेशानी होती थी। सामान्यवर्ग के ज्यादातर छात्र उपलब्धि में उससे आगे रहते। कुॅंये का मेढक अब समुद्र में आ गया था जहाॅं बड़े-बड़े जीव थे। वह सोचने लगी कि अगर सारे होशियार छात्र उससे बात करना बन्द कर दें, तो क्या होगा? शायद वह अपने आपको अपमानित महसूस करेगी। जो कि अन्य छात्रोें से कम उपलब्धि के कारण वह पहले से ही करती है। उसने अपने आप से प्रश्न किया कि इतना अध्ययन करने पर भी उसके सर्वाधिक अंक क्यों नही आते? उसके अन्र्तमन ने उसे समझाने का प्रयास किया कि शायद इसलिये कि वह बहुत से छात्रों ने यहाॅं से स्नातक की पढ़ाई की है .............. बहुतों के भाई-बहिन, मम्मी पापा यहाॅं से पढ़े हैं ........... इसलिये वे यहाॅं की शिक्षा प्रणाली से अवगत है........... उपलब्धि इन सब बातों से भी तो प्रभावित होती हैं। सोचते सोचते वह अतीत में चली गयी............. उसके साथ भी जो छात्रायें पढ़ती थीं शायद किसी को घर का काम करना होता होगा ............ किसी को छोटे भाई-बहिन की देखभाल करनी होती होगी ............... किसी का घर एक कमरे का होगा .............. कहीं ज्यादा रिश्तेदार आते होगें........... उसके साथ ऐसा कोई बन्धन न था। शायद इसलिये उपलब्धि में वह आगे और अन्य छात्रायें उससे पीछे थीं। सोचतें सोचतें उसकी आॅंखे नम हो गयी। आॅंखों के पानी में उसका घमंड बह गया। इस परिसर ने उसे व्यवहारिक डिग्री से अलंकृत किया।

Friday, 6 January 2017



मित्रों आप सभी को नववर्ष की शुभकामनायें ।

2017 की शुरूआत अच्छी रही। आज दिनांक 06-01-2017 अमर उजाला रूपायन में मेरी लघुकथा ʺमहिला डिब्बा‘ प्रकाशित हुई है।


Wednesday, 9 November 2016

CONCEPT MAPPING AS A SUCCESSFUL TOOL FOR TEACHING , LEARNING AND EVALUATION IN PRIMARY GRADES (ARTICLE)

मित्रों,
आज की सुबह बड़ी खुशनुमा रही। डाकिये ने खाकी रंग का आयताकार लिफाफा दिया। खोला तो उसमें प्रतिष्ठित जर्नल प्राइमरी टीचर(अप्रैल-जुलाई 2015) यह जर्नल राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित होता है। इसमें मेरा लेख भी छपा है। 
यह लेख बच्चों के  उप योगी शिक्षणअधिगम एवं मूल्यांकन की एक नई तकनीक से सम्बन्धित है। आप लोग भी पढ़िये और अधिक से अधिक ‘शेयर’ कीजिये।















Tuesday, 8 November 2016

लैंगिक समानता आधारित समाज के लिए पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकों में सुधार जरूरी
डाॅ0 रत्ना गुप्ता

14 अप्रैल को डाॅ0 बी0आर0 अम्बेडकर का जन्म दिवस है उन्होने अपने हिन्दू कोड बिल में उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की थी, लेकिन स्वतन्त्रता प्राप्त करने के 68 वर्ष बाद भी हम उनके लैंगिक समानता आधारित समाज के स्वप्न को साकार नही कर पाये हैं इसका कारण है शैक्षिक लिंग भेद। डिस्ट्रिक्ट इन्फार्मेशन सिस्टम फाॅर एजूकेशन (2011-12) की रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं की साक्षरता 65.5ः और पुरूषों की 82.2ः है प्राथमिक स्तर पर लड़कियों का नामांकन 48.35ः और उच्च स्तर पर 17ः जबकि लड़कों का 20ः है। आल इण्डिया सर्वे आन हायर एजूकेशन 2010-11 के अनुसार स्नातक एवं परास्नातक पाठ्यक्रमों में लड़के एवं लडकियों का नामांकन क्रमशः 45ः एवं 55ः, जबकि पी0एच0डी0 में, 62ः एवं 38ः है।
जेण्डर गैप रिपोर्ट (2015) के अनुसार 145 देशों में भारत की श्रेणी, महिलाओं की शैक्षिक उपलब्धि में 125वीं है और राजनीति में नौवीं है। वास्तव में महिला भारत में राजनैतिक दृष्टि से बड़ी सशक्त है। विभिन्न राज्यों में सर्वोच्च राजनैतिक पदों पर महिलाओं की उपस्थिति इसे विश्व में दूसरा स्थान दिलाती है। अमेरिका जैसे प्रगतिशील देशों में भी अभी तक सर्वेाच्च राष्ट्रपति पद पर महिला आसीन नही हुयी है जबकि हमारे यहाॅं प्रतिभा देवी सिंह पाटिल पहले ही राष्ट्रपति पद को सुशोभित कर चुकी है। 
वर्तमान में मानव संसाधन एवं विकास मन्त्रालय स्मृति ईरानी के पास है अर्थात एक महिला के हाथों में ही महिलाओं को शिक्षित  करने की जिम्मेदारी है लेकिन सर्वोच्च पदों पर महिलाओं के होने के बावजूद भी आम महिलायें शैक्षिक रूप से पुरूषों के बराबर सशक्त नही हो पा रही है और हम ‘प्लेज फाॅर पैरिटी’ को पूरा नही कर पा रहें है।  
आखिर कारण क्या हैं? आइये देखते हैं। 
हमारी संस्कृति में विवाह अनिवार्य माना जाता है, विवाह न करने पर महिला को सम्मान की दृष्टि से नही देखा जाता। कई इलाकों में तो आज भी बाल-विवाह प्रचलित है इसके अतिरिक्त हमारे यहाॅं विवाह की आयु 18 वर्ष है, यह वह उम्र है जब तक शिक्षा पूरी नही हो पाती, इस प्रकार विवाह की अनिवार्यता और कम उम्र में विवाह महिलाओं को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर देता है मुथेजा, पापुलेशन फाउन्डेशन आॅफ इण्डिया, की निर्देशक के अनुसार, ‘‘विवाह पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं के भविष्य को अधिक सीमित कर देता है। 
दूसरा कारण हमारे समाज में दहेज प्रथा का अनेक सरकारी प्रयासों के बावजूद, आज भी प्रचलित होना है। दहेज के बोझ की वजह से माता-पिता लड़कियों की पढ़ाई पर अधिक खर्च नहीं करना चाहते क्योंकि वे जानते है कि उनकी लड़की चाहें कितनी भी सुशिक्षित  क्यों न हो, सुयोग्य वर के लिये उन्हे विवाह पर विपुल धन खर्च करना ही होगा।
तृतीय कारण हमारा पुरूष सत्तात्मक समाज है। हमारे यहाॅं महिलाओं का प्रथम दायित्व गृह-कार्य और बच्चों की परवरिश समझी जाती है, नौकरी करना आवश्यक नही समझा जाता। यह परम्परागत सोच भी महिलाओं की शिक्षा में बाधक है। 
साथ ही साथ विद्यालयों का पहुॅंच से बाहर होना, जहाॅं न बिजली है न आवागमन की सुविधायें है, सभी विद्यालयों में महिला प्रसाधन का न होना और महिला शिक्षकों की सहभागिता अनुपात से कम होना भी महिलाओं के अशिक्षित होने के कारण हैं क्योंकि इन्फार्मेशन सिस्टम फार एजूकेशन (2011-12) की रिपोर्ट के अनुसार, 72.16 प्रतिशत विद्यालयों में महिला प्रसाधन है लेकिन प्राथमिक स्तर पर यह प्रतिशत 65.4 है। महिला शिक्षकों का प्रतिशत प्राथमिक स्तर पर 46.27 है तथा आल इण्डिया सर्वे आॅफ हायर एजूकेशन के अनुसार ‘‘उच्च स्तर पर 59 प्रतिशत महिला शिक्षक हैं। बहुत से अभिभावक पुरूष शिक्षकों से अपनी बेटियों को पढवाना पसन्द नही करते तथा बहुत सी लड़कियाॅं स्वयं भी पुरूष शिक्षकों से पढ़ने में संकोच करती है।
इसके अतिरिक्त महिला हिंसा, निम्न स्वास्थ्य स्तर, जागरूकता की कमी और जेन्डर वायज्ड पाठ्य पुस्तकें भी महिलाओं की शिक्षा के अवरोधक हैं, एन0सी0ई0आर0टी0 की प्राथमिक स्तर की पाठ्यपुस्तकों का लैंगिक विष्लेषण दर्शाता है कि 18 पुस्तकों में महिलाओं को नर्स, शिक्षिका और गृहणी की परम्परागत भूमिकाओं में, जबकि पुरूषों को मुख्य व्यवसायिक भूमिकाओं में चित्रित किया गया है। 
इन चुनौतियों पर विजय पाने के लिये विवाह के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव लाना होगा, विवाह की आयु बढ़ानी होगी, समाज को लड़कियों के प्रति संवेदनशील बनाना होगा, इसके लिये शैक्षिक एवं सामाजिक स्तर पर ‘जेन्डर सेन्सटिव ट्रेनिंग प्रोग्राम’ की शुरूआत करनी होगी। साथ ही साथ विद्यालयों को महिलाओं की पहुॅंच में लाना होगा, महिला शिक्षिकाओं की अधिकाधिक नियुक्ति करनी होगी, विद्यालयों में प्रसाधन सुविधाओं को सुनिश्चित करना होगा पाठ्यक्रम में आत्मरक्षा एवं स्वास्थ्य कार्यक्रमों एवं महिला जागरूकता कार्यक्रमों को सम्मिलित करना होगा, पाठयपुस्तकों को सुधारना होगा जो महिलाओं को कमजोर तरीके से चित्रित करती है तथा इनमें ऐसी विषय वस्तु को स्थान देना होगा जो महिलाओं को प्रेरित एवं सशक्त कर सके जैसे, विकसित देशों में महिलाओं की दशा, महिला अधिकार एवं कानून, महान महिलाओं की जीवनियाॅं, महिला सशक्तीकरण की आवश्यकता आदि, तभी हम शैक्षिक लिंग भेद को मिटा पायेगें तथा अम्बेडकर के लैंगिक समानता आधारित समाज के स्वप्न को साकार कर पायेगें। यही उनके जन्मदिवस पर उन्हे सच्ची पुष्पांजलि होगी।
स्वतन्त्र भारत शाहजहाॅंपुर समाचार पत्र में 16 नवम्बर 2016 को प्रकाशित

चुनाव रैली
चुनाव  का समय था। नेशनल पार्टी की जिला स्तरीय रैली थी। रैली को सम्बोधित करने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष आ रहे थे। पंडाल में लोगों की संख्या कम थी। जिला अध्यक्ष चिन्तित थे। उन्होने अपने एक अनुचर के कान में कुछ पंूछा, अनुचर ने बहुत धीरे से कहा, ‘‘साहब! मजदूरों को बुलाया है’’। 


बहू की समझदारी
दीनानाथ की दोनो किडनी खराब हो गई। उनके आर्थिक हालात अच्छे न थे। इलाज की समस्या थी। दीनानाथ की बहू ने दीनानाथ की पत्नी से कहा, ‘माता जी! बाबू जी बीमार हैंे........। घर में बहुत लोगों का आना जाना रहता है............. आभूषण लाॅकर में रखवा दीजिये।’ दीनानाथ और दीनानाथ की पत्नी ने बहू की तरफ विचित्र नजरों से देखा।